Sunday, March 28, 2010

Welcome to pushkar...

All the reservations, you had hitherto upon seeing or hearing that the
holy Pushkar Lake has no water at all, will now be vanished. The
average monsoon this time will ensure adequate water in the lake on
account of the eliminations of all the blockages, which once existed
in the path of the rain water from Nag hills to the lake. Credit goes
to the endeavours put in to restore the lake under the National Lake
Conservation Mission, which have transformed it to the amazement of
all those fascinated with the lake. This endeavour of the Environment
ministry will not only stimulate both local and international tourism
in Pushkar but resume the faith and belief of the Hindu devotees in
the land of Brahma, which once ended up disappointed seeing it parched
and dug up.
Undertaken jointly by the state and the central governments, the
project under the mission worth 45 crores envisaged the construction
of 4 feeders of 20 kilometers and 14 paccka water tanks with water in
them through artificial filling to protect the sanctity of the land by
keeping the faith of the visiting Hindu devotees intact by enabling
them to have the holy dip.
Nestled amidst the picturesque Nag hills, the adventure loving
tourists are savouring the bike riding in the roads built around the
lake. I welcome all the Facebook users on this land of Lord Brahma,
the creator god of Hindu mythology……..

Welcome to pushkar...

All the reservations, you had hitherto upon seeing or hearing that the
holy Pushkar Lake has no water at all, will now be vanished. The
average monsoon this time will ensure adequate water in the lake on
account of the eliminations of all the blockages, which once existed
in the path of the rain water from Nag hills to the lake. Credit goes
to the endeavours put in to restore the lake under the National Lake
Conservation Mission, which have transformed it to the amazement of
all those fascinated with the lake. This endeavour of the Environment
ministry will not only stimulate both local and international tourism
in Pushkar but resume the faith and belief of the Hindu devotees in
the land of Brahma, which once ended up disappointed seeing it parched
and dug up.
Undertaken jointly by the state and the central governments, the
project under the mission worth 45 crores envisaged the construction
of 4 feeders of 20 kilometers and 14 paccka water tanks with water in
them through artificial filling to protect the sanctity of the land by
keeping the faith of the visiting Hindu devotees intact by enabling
them to have the holy dip.
Nestled amidst the picturesque Nag hills, the adventure loving
tourists are savouring the bike riding in the roads built around the
lake. I welcome all the Facebook users on this land of Lord Brahma,
the creator god of Hindu mythology……..

Wednesday, February 3, 2010

सफ़लता का मूल मंत्र

अपने जीवन उदेश्य को जानना और उसे प्राप्त करने के लिए ढृढ आत्मविशवास रखना, यही सफलता की ओर पहला कदम है । यह अदम्य विचार कि मै अवश्य सफल होऊंगा और उस पर पूरा विश्‍वास ही सफलता पाने का मूल मंत्र है । याद रखिए ! विचार संसार की सबसे महान शक्ति है यही कारण है कि सफलता (Success) पाने वाले लोग पूर्ण आत्मविशवास रखते हुए अपने कर्मो को पूरी कुशलता से करते हैं, दुसरो की सफलता (Success) के लिए भी वे सदा प्रयत्‍नशील रहते हैं । प्रत्येक विचार, प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है अच्छे का अच्छा और बुरे का बुरा । यही प्रकृती का नियम है । इसमे देर हो सकती है पर अंधेर नही । इस लिए आप सफल होना चाहते हैं तो अच्छे विचार रखिए, सद्कर्म करिए और जरुरतमंदो की नि:स्वार्थ भाव से सहायता तथा सेवा करिए । मार्ग मे आने वाली कठिनाइयों, बाधाओं और दुसरो की कटुआलोचनाओं से अपने मन को अशांन न होने दीजिए। जब अपनी समस्या न सुलझे जव कोइ अपनी समस्या को हल न कर सके तो उस के लिए सब से अच्छा तरीका एक ऎसे व्यक्ति की खोज करना है जिसके पास उससे भी अधिक समस्याऎं हो, और तब वह उन्हे हल करने मे उस की सहायता करे। आप की समस्या का हल आप को मिल जाएगा । चौकिए मत, इसे आजमाइए।

बीज और फल अलग अलग नही
विश्‍व प्रसिद्ध विचारक इमर्सन ने ठीक ही कहा है कि - "प्रत्येक कर्म अपने मे एक पुरुस्कार है। यदि कर्म भली प्रकार से किया गया होगा और शुभ होगा, तो निश्‍चय ही उस का फल भी शुभ होगा। इसी प्रकार गलत तरीके से किया गया अशुभ कर्म हानिकारक होगा"। आप इसे पुरातन पंथ नैतिकता कह सकते हैं, जो कि वास्तव मे यह है । लेकिन, साथ साथ ही, यह आधुनिक नैतिकता भी है। यह उस समय भी प्रभावशाली था, जब मनुष्य ने पहिए का अविष्कार किया था और भविष्य मे भी प्रभावशाली रहेगी, जब मनुष्य दुसरे ग्रहो मे निवास करने लगेगा । यह नैतिकता से अधिक प्रकृति का क्षतिपूर्ति नियम है। जो जैसा करेगा वैसा भरेगा। वैज्ञानिक दृष्टी से कर्म और फल के रुप मे दर्शाया जा सकता है । जैसे बीज बोएंगे वैसे फल पाएगे।

अंधविश्‍वास सफलता (Success) मे सबसे बडी बाधक
मनुष्य जीवन भर इस अज्ञानपूर्ण अंधविश्‍वास से चिंतिंत रहते हैं कि कही उसे कोइ धोखा न दे जाए। उसे यह ज्ञान नही होता कि मनुष्य को स्वयं उस के सिवाए कोइ दूसरा धोखा नही दे सकता, वास्तव मे, वह अपने ही मोह और भय के कारण धोखे मे फंसता है। हम भूल जाते हैं कि एक परमशक्ति भी है जो सदैव हर व्यक्ति के साथ रहती है। जब कोइ व्यक्ति किसी से कोइ समझोता या अनुबंध करता है, तो यह परमशक्ति अदृश्य और मौनरुप से एक साक्षी की तरह ‍उपस्थित रहती है।
हम इस दुनियां को धोखा दे सकते है पर इस अदृश्य शक्ति को नही। इसलिए जो व्यक्ति दूसरो को धोखा दे कर या उस का शोषण करके जो व्यक्ति सफलता (Success) या धन प्राप्त करना चाहता है उसको अन्त मे भयानक परिणामों को भुगतना पडता है। यही कारण है कि संसार के सभी संतों और महापुरुषो ने नि:स्वार्थ कार्य करने पर बल दिया है।
भय सफलता (Success) का दुशमन
सफलता (Success) के मार्ग मे पडने वाली सबसे बडी बाधा हमारा भय ही है, वही हमारा दुशमन है अत: हमे भयभीत नही होना चाहिए। इसको दुर करने के लिए सर्वोत्त्म उपाय यह है कि हम जिस वस्तु, आदमी या परिस्थिति से भयभीत होते है, उसी का बुद्धिमानी पूर्ण साहस से सामना करें। भय के कारणो पर विचार कर उन्हे दुर करें और जिस सद्कार्य को करने से भय अनुभव होता हो उसे परमात्मा पर अटूट श्रद्धा और आत्मविश्‍वास रखते हुए कर डालें। स्मरण रखिए आप का भय कोई दुसरा दुर नही कर सकता, वह केवल आप को सलाह दे सकता है, उसे दुर तो आप को ही करना होगा ।
जलन से बचिए

ईष्या या जलन से हमारी मानसिक शान्ति भंग होती है जिस के कारण हम अपने कार्यो को पूरी योग्यता से नही कर पाते। इस का परिणाम यह होता है कि कर्म मे न सफलता (Success) मिलती है और न ही मानसिक आनंद। हमें दुसरो की उन्नति या चमक दमक को देख कर जलना नही चाहिए। ईष्या, द्वेष साधारण भाषा मे जलन कहते हैं। सच मे यह जलन हमारी कार्यकुशलता, मानसिक शान्ति और संतुलन को जला डालती है। अत: यदि हम अपने जीवन मे सफलता (Success) पाना चाहते हैं, तो जलन से बचना चाहिए ।

वैज्ञानिक-सी सोच
हमारे मस्तिष्क के विचारों में संसार को बदल देने की शक्‍ति है। विचारों की शक्‍ति को एकाग्र करके आप अपने आप जीवन की समस्त बाधाओं और कठिनाईयों को दुर कर वांछित सफलता (Success) प्राप्‍त कर सकते हैं विचारों की शक्‍ति से पहाड को भी हटाया जा सकता है। मनुष्य एक विचारशील प्राणी है, किसी भी कार्य को करने से पहले हमारे मन मे उस को करने का विचार आता है। यह मानव के विचारों की ही शक्‍ति है, जो आज वह अंतरिक्षयानो के द्धारा ‍ऎसे महान व अतभुत कार्य कर रहा है जिस की पहले कलपना ही की जा सकती थी। ध्यान रहे, एक मूर्ख और वैज्ञानिक विचारो मे भौतिक अंतर होता है, जहां एक मुर्ख के विचार तर्कहीन और बेतुके होते हैं, वही वैज्ञानिक के विचार तर्कसंगत, व्यवस्थित, तथा प्राकृतिक नियमो पर आधारित होता है। जीवन मे सफल होने के लिए एक वैज्ञानिक के तरह विचार करना अवश्यक होता है ।

Tuesday, February 2, 2010

किसी भी व्यक्‍ति का व्यक्‍तित्व उसके चरित्र की विशेषताओं व व्यवहार के मेल से बनता है, जो उस के सभी कामो मे झलकता है। इस व्यवहार मे चेतन और अवचेतन दोनो प्रकार के व्यवहार शामिल हैं। हमारा व्यवहार पूरे जीवन मे कई तथ्यो के प्रभाववश समय-समय पर बदलता रहता है। हमारे जीने और काम करने के तरीके मे लगातार बदलाव आता रहता है । यद्यपि इन बदलावो के बावजूद व्यवहार की जो छाप पहले- पहल पडती है वह आसानी से मिट नही पाती। हमारा व्यक्‍तित्व, हमारा अस्तित्व, इसी जीवन का एक अंग है। हमारे विश्‍वास उन पत्तों की तरह है, जिनका जीव आकृति विज्ञान, संसाधन एकत्र करने व आत्म विचारों को सुधारते है। इन्ही से मिल्कर हमारा व्यक्‍तित्व बनता है। व्यक्‍तित्व को निखारने से व्यक्‍ति न केवल स्वंय बेहतर प्रदर्शन करता है अपितु अपनी टीम से भी बेहतर करबा सकता है। एक अच्छे व्यक्‍तित्व मे नेतृत्व की सभी विशेषताएं होती है जो आज के समय मे बहुत ज़रुरी है। व्यक्‍तित्व से ही झलक मिलती है कि सामने वाले व्यक्‍ति मे नेतृत्व की क्षमता है कि नही? इसी सीमा तक आकर व्यक्‍तित्व व नेतृत्व की क्षमताएं मिलकर किसी व्यक्‍ति को क्षेत्र विशेष मे सफल बनाती है। अपनी छिपी प्रतिभा को निखारने के लिए कुछ सुझाव दिए गए है लेकिन वे अंतिम सत्य नही है। आप अपनी इच्छाअनुसार इसमे कुछ भी घटा या बढा सकते हैं लेकिन एक वात तो निश्‍चित ही है, व्यक्‍तित्व विकास कोई एक दिन मे किया जाने वाला पाठय़क्रम नही है। इसमे आपके पूरे जीवन के रहने और काम करने का तौर- तरीका भी शामिल है । आप अपने व्यक्‍तित्व को कैसे निखार सकते है? जो भी कार्य करें, उस मे श्रेठ प्रदर्शन करें ।
एक सफल व संपूर्ण व्यक्‍तित्व का सफलता से गहरा संबंध होता है। यह सफलता पाने के अवसरों को बढा सकता है। हम इस संसार मे आद्धितीय क्षमताओं के साथ आए है। हमारे जैसा कोई नही है। हमारे व्यवहार, आचरण और भाषा पर वर्षो से हमारे परिवार, स्कूल, मित्र, अध्यापकों व वातावरण की छाप होती है। आप बस इतना करे कि सहज व प्राकृतिक बने रहें। लोग दिखावटी चेहरों को आसानी से पहचान लेते हैं। हम सब के पास कोई न कोई प्राकृतिक हुनर है। आप व्यक्‍तित्व को निखारना चाहते है तो अपने भीतर छिपे उस प्रतिभा, हुनर को पहचान कर उभारें। हर कोई एक अच्छा गायक या वक्ता नही बन सकता। यदि विंस्टन चर्चिल ने एक प्रेरणास्पद नेता बनने की बजाए गायक बनने की कोशिश की होती तो शायद वह कभी उसमे सफल नही हो पाते। इसी तरह महात्मा गाँधी एक अच्छे व्यवसायी नही बन सकते थे। हम सब हालात के प्रति अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। किसी दूसरे की नकल करने की वजाए वही रहें, जो आप है हर कोई मिस्टर या मिस यूनिवर्स तो नही बन सकता लेकिन दूसरो के अनूभवो से सीखकर अपने में सुधार तो ला सकता है। जीवन मे थम कर बैठने के बजाए बेहतरी का कोई न कोई उपाय आज़माते रहना चाहिए । व्यक्‍तित्व का उपलब्धियो व प्रदर्शन से संबंध होता है, इस दिशा मे पहला कदम यही होगा कि आप तय करें कि आप क्या बनना चाहते है और आप उस के लिए क्या करने जा रहे हैं। आपकी योजना व्यवहारिक व स्पष्‍ट होनी चाहिए । सफलता की सभी योजनाए कल्पना से ही आरंभ होती है। योजना को हकीकत मे बदलने के लिए कल्पना शक्‍ति का प्रयोग करें। योजनाबद्ध कार्य, धैर्य, दृड संकल्प किसी भी सपने को साकार कर सकता है।

Sunday, January 31, 2010

योग शब्द का अर्थ है जुडना, यदि इस शब्द को आध्यात्मिक अर्थ मे लेते है तो इस का तात्पर्य आत्मा का परमात्मा से मिलन और दोनो का एकाग्र हो जाना है। भक्त का भगवान से, मानव का ईश्वर से, व्यष्टि का समष्टि से, पिण्ड का ब्रह्मण्ड से मिलन को ही योग कहा गया है, हकीकत मे देखा जाए तो यौगिक क्रियाओ का उद्देश्य मन को पूर्ण रुप से प्रभु के चरणो मे समर्पित कर देना है । ईश्वर अपने आप मे अविनाशी और परम शक्तिशाली है। जब मानव उस के चरणो मे एकलय हो जात है तो उसे असीम सिद्धि दाता से कुछ अंश प्राप्त हो जाता है, उसी को योग कहते हैं।

चित वृतियों पर नियंत्रण और उस का विरोध ही दर्शन शास्त्र में योग शब्द से विभूषित हुआ है। जब ऎसा हो जाता है और ऎसा होने पर उस व्यक्ति को भूत और भविष्य आंकने मे किसी प्रकार की कोई परेशानी नही होती, वह अपने संकेत से ब्रह्मण्ड को चलायमान कर सकता है।

भारतीय योग शास्त्र मे इसके पांच भेद बताए गए हैं-


हठ योग

ध्यान योग

कर्म योग

भक्ति योग

ज्ञान योग

मूलत: मनुष्य मे पांच मुख्य शक्तियां होती है उन शक्तियों के अधार पर ही योग के उपर लिखे भेद या विभाजन संभव हो सका है। प्राण शक्ति का हठ योग से, मन शक्ति का ध्यान योग से, क्रिया शक्ति का कर्म योग से, भावना शक्ति का भक्ति योग से, बुद्धि शक्ति का ज्ञान योग से पूर्णत: सम्बन्ध है । वर्तमान काल मे इस विष्य पर जो ग्रन्थ प्राप्त होते है उन मे हठ योग प्रदीपिका, योग दर्शन, गोरख संहिता, हठ योग सार, तथा कुण्ड्क योग प्रसिद्ध हैं। पतांजलि का योग दर्शन इस सम्बन्ध मे प्रमाणिक ग्रन्थ माना गया है।


महार्षि पतांजलि ने चित की वृतियों का विरोध योग के माध्यम से बताया है और उनके अनुसार योग के आठ अंग हैं, जो कि निम्नलिखित हैं

१ यम २ नियम ३ आसन ४ प्रणाय़ाम ५ प्रत्याहार ६ धारणा ७ ध्यान

८ और समाधि





ऊपर जो आठ अंग बताए गए हैं उनमे से प्रथम पांच अंग बाहरी तथा अन्तिम तीन अंग भीतरी या मानसी कहे गए हैं।

यम:- अहिंसा, सत्य,अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह का व्रत पालन ही 'यम' कहा जाता है।

नियम:- स्वाध्याय, सन्तोष, तप, पवित्रता, और ईश्वर के प्रति चिन्तन को नियम कहा जाता है।
आसन:- सुविधापूर्वक एक चित और स्थिर होकर बैठने को आसन कहा जात है।

प्राणायाम:- श्‍वास और नि:श्‍वास की गति को नियंत्रण कर रोकने व निकालने की क्रिया को प्राणायाम कहा जाता है।

प्रत्याहार:- इन्द्रियों को अपने भौतिक विषयों से हटाकर चित मे रम जाने की क्रिया को प्रत्याहार कहा जाता है।

जब यह पांच कर्त्तव्य सिद्ध हो जातें हैं या इनमे से जब कोई साधक पूर्णता प्राप्त कर लेता है तभी उसे योग के आगे की क्रियायों मे प्रवेश की अनुमति दी जाती है। प्रत्येक साधक को चाहिए कि वह बाह्य अभ्यासों को सिद्ध करने के बाद ही आगे के तीन अभ्यासों मे प्रवेश करें तभी उसे आगे के जीवन मे पूर्णता प्राप्त हो सकती है।

धारण:- चित्त को किसी एक विचार मे बांध लेने की क्रिया को धारण या धारणा कहा जाता है।

ध्यान:- जिस वस्तु को चित मे बांधा जाता है उस मे इस प्रकार से लगा दें कि बाह्य प्रभाव होने पर भी वह वहां से अन्यत्र न हट सके, उसे ध्यान कहते है।

समाधी:- ध्येय वस्तु के ध्यान मे जब साधक पूरी तरह से डूब जाता है और उसे अपने अस्तित्व का ज्ञान नही रहता है तो उसे समाधी कहा जाता है।